
चरित्र के बारे में अनमोल विचार चाणक्य नीति
आचार्य ने विशेष रूप से मनुष्य के आचार अर्थात चरित्र के संबंध में कुछ बातें कही हैं। माना है कि अच्छे कुल में कहीं न कहीं किसी प्रकार का दोष मिल ही जाता है और संसार में था। कौन-सा पुरुष है, जो कभी रोगों का शिकार न हुआ हो। सभी में कोई न-कोई व्यसन भी होता है। इस संसार में लगातार किसको सुख प्राप्त होता है अर्थात कोई सदा सुखी नहीं रह सकता, कभी-नकभी वह। कष्टों में पड़ता ही है।
सुखदुख का संबंध दिन-रात की तरह है। महान व्यक्तियों को और धर्मात्माओं को अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं। ऐसा संसार का नियम है। चाणक्य का मानना है कि मनुष्य के आचार-व्यवहार से, बोलचाल से, दूसरों के प्रति मान-सम्मान प्रकट करने से उसके कुल की विशिष्टता का ज्ञान होता है।
आचार्य चाणक्य द्वारा चरित्र के बारे में अनमोल विचार
आचार्य का मानना है कि पुत्री का विवाह अच्छे आचरणशील परिवार में करना चाहिए और पुत्रों को ऐसी प्रेरणा देनी चाहिए कि वे उच्च शिक्षा प्राप्त करेंशिक्षा ही जीने की कला सिखाती है। शत्रु को व्यसनों में फंसाने की बात करते हुए आचार्य संकेत करते हैं कि शत्रु का नाश बौद्धिक चातुर्य के साथ किया जाना चाहिए। इसलिए सावधान रहें और लाभ उठाएं।
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चाणक्य ने शिक्षा और बुद्धिमत्ता पर सब कार्यों की अपेक्षा अधिक जोर दिया है। वे कहते हैं कि पूर्व भी सज्जन और बुद्धिमान की तरह दो पैर वाला होता है परन्तु वह चार पैर वाले पशु से भी निकृष्ट और गया-गुजरा माना जाता है, क्योंकि उसके कार्य सदैव कष्ट पहुंचाने वाले होते हैं।
चाणक्य कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अच्छे कुल में उत्पन्न हुआ है तथा रूप और यौवन आदि से भी युक्त है, परंतु उसने विद्या ग्रहण नहीं की तो यह सब उसी प्रकार निरर्थक है जिस प्रकार बिना सुगन्ध के सुन्दर फूल। उनका मानना है कि किसी का सम्मान उसके गुणों के कारण होता है, न कि रूप और यौवन के कारण।
आचरण से संबंधित एक और महत्वपूर्ण चाणक्य बात ने यह कही है कि यदि किसी एक व्यक्ति के बलिदान से पूरे कुल का कल्याण हो तो उसका बलिदान कर देना चाहिएपरन्तु उन्होंने मनुष्य को सर्वोपरि माना है और वे कहते हैं कि यदि व्यक्ति अपने कल्याण के लिए चाहे तो प्रत्येक वस्तु का बलिदान कर सकता है।
उनका मानना है कि व्यक्ति को अपनी निर्धनता दूर करने के लिए उद्यम और पापों से बचने के लिए प्रभु का स्मरण करते रहना चाहिए उन्होंने बार-बार मनुष्य को सचेत किया है कि वह किस प्रकार कष्टों से बच सकता है। उनका कहना है कि व्यक्ति को सदैव सतर्क रहना चाहिए आचरण में आचार्य किसी भी तरह की अति के पक्ष में नहीं हैं। आचार्य के अनुसार मधुर भाषण करने वाला व्यक्ति समूचे संसार को अपना बना सकता है।
अनेक कुपुत्र होने के बजाय एक सुपुत्र होना कहीं अच्छा है। चाणक्य ने बाल मनोविज्ञान पर भी प्रकाश डाला है। उनका कहना है कि पांच वर्ष तक की आयु के बच्चे से लाड़-दुलार करना चाहिएइसके बाद की आयु में अनुशासित करने के लिए डांटफटकार, ताडना करने की आवश्यकता हो, तो वह भी करनी चाहिएपरन्तु जब बच्चा सोलह वर्ष की आयु तक पहुंच जाता है तब उसे मित्र के समान समझकर व्यवहार करना चाहिए.
श्लोक में ‘पुत्र शब्द का प्रयोग संतान के अर्थ में किया गया है। बेटियों के संदर्भ में भी यही नियम लागू होता है। आचार्य ने बार-बार मनुष्यों को यह बताने-समझाने का प्रयत्न किया है कि यह मानव शरीर अत्यन्त मूल्यवान है। व्यक्ति को अपना दायित्व निभाने के लिए यथाशक्ति धर्माचरण करते रहना चाहिए।
आचार्य चाणक्य द्वारा चरित्र अध्याय के बारे में आखरी विचार
आचार्य चाणक्य द्वारा चरित्र के बारे में अनमोल विचार: चाणक्य इस अध्याय के अन्त में समूचे समाज को मूखर्यों से बचने का परामर्श देते हैं। अपने अन्न तथा अन्य उत्पाद को ठीक ढंग से संभालकर रखना चाहिए और आपस में प्रेमपूर्वक रहना चाहिएझगड़े फसाद में अपना जीवन नष्ट नहीं करना चाहिए। ऐसा करके हम स्वयं जो दुख के गर्त में डालते हैं।